ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग ( ZBNF)


Ajit Kumar AJIT KUMARWISDOM IAS, New Delhi.

 
ज़ीरो बजट का अर्थ है चाहे किसी भी सामान्य फसल अथवा बागवानी की फसल का उत्पादन किया जाए उसकी लागत का मूल्य ज़ीरो होना चाहिये। फसलों के उत्पादन आदि के लिये जिन संसाधनों की आवश्यकता होती है वे सभी घर में ही उपलब्ध करना।

सामान्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र पर आधारित है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि एक देसी गाय के गोबर एवं गोमूत्र से एक किसान तीस एकड़ ज़मीन पर ज़ीरो बजट खेती कर सकता है।

गाय के एक ग्राम गोबर में असंख्य सूक्ष्म जीव होते हैं जो किसी भी फसल के लिये आवश्यक 16 तत्त्वों की पूर्ति करते हैं। इस विधि के अंतर्गत 90 फीसद पानी और खाद की बचत होती है।
 
देसी प्रजाति के गौवंश के गोबर एवं मूत्र से जीवामृत, घनजीवामृत तथा जामन बीजामृत बनाया जाता है। इनका खेत में उपयोग करने से मिट्टी में पोषक तत्वों की वृद्धि के साथ-साथ जैविक गतिविधियों का विस्तार होता है। जीवामृत का महीने में एक अथवा दो बार खेत में छिड़काव किया जा सकता है।जबकि बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है। इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिये पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है ।
 
जीरो बजट खेती के जनक महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों को इस कृषि पद्धति में प्रशिक्षित करने का कार्य कर रहे हैं।

आंध्र प्रदेश जीरो बजट प्राकृतिक खेती को अपनाने वाला पहला राज्य है, जबकि हिमाचल प्रदेश दूसरा राज्य है।
 
प्रयोग
जहाँ जीवामृत का महीने में एक या दो बार खेत में छिड़काव किया जाता है, वहीं बीजामृत का इस्तेमाल बीजों को उपचारित करने में किया जाता है।

वस्तुतः इस विधि से खेती करने वाले किसान को बाज़ार से किसी प्रकार की कोई खाद और कीटनाशक खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ती है।

इसके अतिरिक्त इस विधि से खेती करने पर फसलों की सिंचाई के लिये आवश्यक पानी एवं बिजली भी मौजूदा खेती-विधि की तुलना में दस प्रतिशत ही खर्च होती है।

जैविक खेती Vs नेचुरल फार्मिंग

यदि इस प्रश्न के संदर्भ में नेचुरल फार्मिंग के सूत्रधार महाराष्ट्र के सुभाष पालेकर की बात मानें तो ज्ञात होता है कि जैविक खेती रासायनिक खेती से भी अधिक हानिकारक, विषैली और खर्चीली साबित होती है।

श्री पालेकर के अनुसार, वैश्विक तापमान वृद्धि में रासायनिक खेती एवं जैविक खेती एक महत्त्वपूर्ण यौगिक के रूप में प्रस्तुत होती है।

जैविक व रासायनिक खेती प्राकृतिक संसाधनों के लिये निरंतर खतरा बनती जा रही है। इससे मिट्टी का पीएच मानक लगातार बढ़ रहा है, जिसके परिणामस्वरूप अधिक लागत पर ज़हरीला अनाज पैदा हो रहा है जो कैंसर जैसी बीमारियों के पैदा होने का कारण बन रहा है।

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार फसल की बुवाई से पहले खेत में वर्मी कम्पोस्ट और गोबर खाद को डाला जाता है। इस खाद में निहित 46 प्रतिशत उड़नशील कार्बन (नायट्रस, आक्साइडस, मिथेन आदि) 36 से 48 डिग्री सेल्सियस तापमान के दौरान वायुमंडल में मुक्त हो जाता है जो कि ग्रीन हाउस गैसों के निर्माण में सहायक होता है।

श्री पालेकर के अनुसार, वर्मी कम्पोस्ट खाद के निर्माण में इस्तेमाल किये जाने वाले आयातित केंचुएँ भूमि के उपजाऊपन के लिये हानिकारक होते हैं। इसका कारण यह है कि ये जीव देशी केंचुआ न होकर आयसेनिया फिटिडा नामक एक जंतु होता है, जो भूमि में उपस्थित काष्ट पदार्थ और गोबर को भोजन के रूप में ग्रहण करता है।

इन जीवों और देसी केंचुओं में मुख्य अंतर यह होता है कि देसी केंचुआ मिट्टी एवं इसके साथ ज़मीन में मौजूद कीटाणु एवं जीवाणुओं का सेवन कर उन्हें खाद के रूप में रूपान्तरित कर देता है।

साथ ही इसमें निरंतर ज़मीन में ऊपर नीचे होने की प्रवृत्ति होती है, जिससे भूमि में असंख्य छिद्र हो जाते हैं। इसका लाभ यह होता है कि इन असंख्य छिद्रों के माध्यम से भूमि में वायु का संचार एवं बरसात के जल का पुर्नभरण हो जाता है। इस प्रकार से देसी केंचुआ जल प्रबंधन के संदर्भ में सबसे बेहतर वाहक के रूप में प्रयुक्त होता है। साथ ही खेत की जुताई के संबंध में प्राकृतिक ‘हल’ का भी काम करता है।

स्पष्ट रूप से न केवल मनुष्य बल्कि पर्यावरण को सुरक्षित एवं स्वस्थ बनाए रखने के लिये ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग को अपनाने पर अधिक बल दिया जा रहा है।

सफल उदाहरण

राजस्थान में सीकर ज़िले के एक प्रयोगधर्मी किसान कानसिंह कटराथल ने अपने खेत में नेचुरल फार्मिंग विधि अपनाकर उत्साहवर्धक सफलता हासिल की है।

वर्तमान में आंध्र प्रदेश में लगभग डेढ़ लाख किसान ज़ीरो बजट नेचुरल फार्मिंग कर रहे हैं। इसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जगह स्थानीय स्तर पर मौजूद गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़ और चने के आटे का इस्तेमाल किया जा रहा है। इन सभी पदार्थों को एक साथ मिलाकर इनका किण्वन किया जाता है, इसे जीवामृत कहते हैं।

जब इस मिश्रण को खेती योग्य भूमि में मिलाया जाता है तो यह मिट्टी में ऐसी सूक्ष्मजैविक क्रियाओं को प्रोत्साहित करता है जो न केवल उच्च उत्पादकता को बल देती है बल्कि फसल को विभिन्न प्रकार की बीमारियों एवं कीटों के हमले से भी बचाती है।

उपज

रासायनिक खेती की तुलना में ZBNF में विभिन्न नगद और खाद्य फसलों की उच्च पैदावार की दर देखी गई है। उदाहरण के लिये, (खरीफ) 2017 के पायलट चरण में ZBNF भूखंडों से प्राप्त कपास की उपज गैर- ZBNF भूखंडों की तुलना में औसतन 11% अधिक थी। इसी प्रकार गुली रागी (ZBNF) गैर- ZBNF उपज की तुलना में 40% अधिक थी।
इन सबके साथ-साथ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मॉडल ZBNF खेतों में सूखे और बाढ़ का सामना करने की क्षमता सामान्य खेतों की अपेक्षा काफी अधिक होती है, जो जलवायु परिवर्तन की समस्या के संबंध में एक बड़ी राहत प्रदान करती है।
इसके अलावा एक ही क्षेत्र में कई प्रकार की फसलों और सीमा फसलों के रोपण से न केवल आय में वृद्धि होती है बल्कि पोषक तत्त्वों को भी बल मिलता है।
जैसा हम सभी जानते हैं कि 2016 की शुरुआत में सिक्किम को भारत का पहला पूर्ण जैविक राज्य घोषित किया गया था। जैविक खेती में अक्सर बड़ी मात्रा में वर्मी कंपोस्ट और अन्य सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनकी खरीद-फरोख्त में काफी निवेश की ज़रूरत होती है। ऐसे में जैविक खेती छोटे किसानों के लिये फायदेमंद प्रतीत नहीं होती है।




Sunday, 28th Jul 2019, 06:08:01 PM

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