फिर से धधक उठा है पश्चिम बंगाल का गोरखा लैंड


Ajit Kumar AJIT KUMARWISDOM IAS, New Delhi.


14 Jun 2017,  पश्चिम बंगाल का पर्वतीय क्षेत्र एक बार फिर हिंसा की आग में झुलस रहा है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के इस विरोध प्रदर्शन में जहां कई सरकारी दफ्तरों को आग के हवाले कर दिया गया और गाड़ियां फूंक दी गईं।


पश्चिम बंगाल सरकार के बांग्ला भाषा को स्कूलों में अनिवार्य बनाये जाने से जुड़ी अधिसूचना आने के बाद से दार्जिलिंग में तनाव जारी है। हालांकि इस मामले में ममता बनर्जी की अलग दलील है. उनका कहना है कि वह बंगाली को तरजीह नहीं दे रही हैं बल्कि राज्य में त्रिभाषा फॉर्मूले को लागू कर रही हैं. ममता ने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने ही प्रदेश सरकार की नौकरियों में भर्तियों के लिए नेपाली को आधिकारिक भाषाओं में शामिल किया है.

बहुत पुरानी है गोरखालैंड की मांग
 
1865 में जब अंग्रेजों ने चाय का बगान शुरू किया तो बड़ी तादाद में मजदूर यहां काम करने आए. उस वक्त कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा नहीं थी, लिहाजा ये लोग खुद को गोरखा किंग के अधीन मानते थे. इस इलाके को वे अपनी जमीन मानते थे. लेकिन आजादी के बाद भारत ने नेपाल के साथ शांति और दोस्ती के लिए 1950 का समझौता किया.

सीमा विभाजन के बाद यह हिस्सा भारत में आ गया. उसके बाद से ये लोग लगातार एक अलग राज्य बनाने की मांग करते आ रहे हैं. बंगाली और गोरखा मूल के लोग सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तौर पर एक दूसरे से अलग हैं, जिससे इस मांग को और बल मिलता रहा.

भारत सरकार इस मांग से बचती रही. सरकार को यह आशंका है कि अगर गोरखालैंड बनाने की इजाजत दे दी जाती है तो ये भारत से अलग होकर नेपाल में मिल सकते हैं.
 
अस्सी के दशक में जिस वक़्त इंदिरा गांधी और मोरारजी देसाई देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे उस समय नेपाली भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए हिंसक झड़पें हुई थी।

गोरखालैंड की मांग की शुरुआत सबसे पहले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के सुभाष घिसिंग ने की थी. पहली बार 5 अप्रैल 1980 को घिसिंग ने ही 'गोरखालैंड' नाम दिया था. इसके बाद पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (डीजीएचसी) बनाने पर राजी हुई. घिसिंग की लीडरशिप में अगले 20 साल तक वहां शांति बनी रही. लेकिन विमल गुरुंग के उभरने के बाद हालात बदतर हो गए.
गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर विमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा की नींव रखी और गोरखालैंड की मांग फिर तेज हो गई. जिस हिस्से को लेकर गोरखालैंड बनाने की मांग की जा रही है उसका टोटल एरिया 6246 किलोमीटर का है. इसमें बनारहाट, भक्तिनगर, बिरपारा, चाल्सा, दार्जिलिंग, जयगांव, कालचीनी, कलिम्पोंग, कुमारग्राम, कार्सेंग, मदारीहाट, मालबाजार, मिरिक और नागराकाटा शामिल हैं.
 
सुभाष घिसिंग ने की थी गोरखालैंड की मांग की शुरूआत

आज जिस गोरखालैंड को भाषाई आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग की जा रही है ऐसा माना जा रहा है कि इसकी शुरूआत सबसे पहले गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के सुभाष घिसिंग ने की थी। पहली बार पांच अप्रैल 1980 को घिसिंग ने ही गोरखालैंड नाम दिया था। जिसके बाद पश्चिम बंगाल सरकार दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल बनाने पर राजी हुई थी।
लेकिन, अब बिमल गुरूंग के उभरने के बाद हालात काफी खराब हुए हैं। बिमल गुरूंग ने गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग होकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बनाया। जिसके बाद गोरखालैंड की मांग तेज़ हो गई। गोरखालैंड में जो इलाके आते हैं वो हैं- बनारहाट, भक्तिनगर, बिरपारा, चाल्सा, दार्जिलिंग, जयगांव, कालचीनी, कलिम्पोंग, कुमारग्राम, कार्सेंग, मदारीहाट, मालबाज़ार, मिरिक और नागरकाटा। 

त्रिपक्षीय बातचीत शुरू
पहली बार 8 सितंबर 2008 को भारत सरकार, पश्चिम बंगाल और पहाड़ की राजनीतिक पार्टियों के बीच बैठक हुई. राजनीतिक पार्टियों ने  51 पेज का एक मेमोरैंडम यूनियन होम सेक्रेटरी को भेजा.
करीब साढ़े तीन साल के विरोध के बाद राज्य सरकार के साथ उनकी सहमति बनी. इस सहमति के बाद एक अर्द्ध स्वायत्त संगठन बनाया गया. इसने डीजीएचसी की जगह ली. 18 जुलाई 2011 को सिलीगुड़ी के नजदीक पिनटेल में उस वक्त के गृहमंत्री पी चिदंबरम, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के नेताओं के बीच मेमोरैंडम पर समझौता हुआ.
29 अक्टूबर 2011 को गोरखा जनमुक्ति मोर्चा और अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद (एबीएवीपी) ने मिलकर 18 बिंदुओं पर समझौता किया. इसके बाद गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) की जगह नई प्रशासकीय संगठन गोरखालैंड एंड आदिवासी टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीएटीए) बना.
गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने इस इलाके में चुनाव का ऐलान किया था. लेकिन जस्टिस सौमित्र सेन के सुझाव से नाराज होकर चुनाव का बहिष्कार कर दिया था.
तराई और दुआर के इलाकों को एक करने का सुझाव दिया था. इस सुझाव से नाराज राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव का बहिष्कार कर दिया. लेकिन बाद में तृणमूल ने यहां चुनाव न लड़ने का फैसला किया और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को सभी 45 सीटें मिल गई.



Wednesday, 14th Jun 2017, 04:14:09 PM

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