निष्क्रिय इच्छामृत्यु (passive euthanasia)


Ajit Kumar AJIT KUMARWISDOM IAS, New Delhi.

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सुप्रीम कोर्ट के संवैधानिक खंडपीठ (5) ने मार्च 9, 2018 के  एक ऐतिहासिक निर्णय में भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की इजाजत दे दी है . साथ हीं न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु को भी मान्यता प्रदान कर दी है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनुष्य को गरिमा के साथ मरने का अधिकार है. इस प्रकार, अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीने क्र अधिकार के अंतर्गत एक और  अधिकार जोड़ दिया गया है और  वह है गरिमापूर्ण मरने का अधिकार .
 निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर इस फैसले को तीन विन्दुओ में समझा जा सकता है –
(i) यदि ऐसी स्थिति आती है कि किसी व्यक्ति को केवल लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर हीं जिन्दा रखा जा सकता है तो वह व्यक्ति  इच्छा मृत्यु पर  फैसला ले सकता है और वह कह सकता है कि वह इच्छा मृत्यु चाहता है ,  जिसे डॉक्टर एवं परिवार वालों को मानना होगा
(ii) यदि इच्छा मृत्यु पर मरीज फैसला लेने में सक्षम नहीं है तब डॉक्टर एवं परिवार वाले मिलकर फैसला ले सकते हैं .
(iii) कोई भी व्यक्ति इच्छा मृत्यु के लिए  वसीयत बना सकता है - कि भविष्य  में यदि ऐसी स्थिति आती है कि लाइफ स्पोर्ट सिस्टम पर हीं जीना पड़े तो उसे इच्छा मृत्यु दे दी जाय
निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट के गाइडलाइंस होगा जबतक इसपर कोई कानून नहीं बन जाता है
सिविल सेवा के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न निम्न हो सकते है –
(i) इच्छामृत्यु क्या है ?
इच्छामृत्यु के दो प्रकार हैं -  जिनमें से पहला सक्रिय इच्छामृत्यु ( एक्टिव  यूथेनेशिया) है और दूसरा निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पेसिव  यूथेनेशिया)है. इन दोनों में बहुत अंतर है. सक्रिय इच्छामृत्यु वह है जिसमें चिकित्सा पेशेवर, या कोई अन्य व्यक्ति कुछ जानबूझकर ऐसा करते हैं जो मरीज के मरने का कारण बनता है. निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive euthanasia) तब होती है जब गंभीर लाइलाज बीमारी से ग्रस्त रोगी के लिए मौत के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं रह जाता और मरीज की मर्जी से से ही उसे मौत दी जाती है.

निष्क्रिय इच्छामृत्यु के मामलों में मरीज की लाइफ सपोर्टिंग मशीनें बंद कर दी जाती हैं. जीवन को विस्तारित करने वाली दवाएं बंद कर दी जाती हैं.

सरल शब्दों में निष्क्रिय और सक्रिय इच्छा मृत्यु के बीच अंतर को 'मरने' और 'हत्या' के बीच अंतर के रूप में भी देखा जाता है.
(2) अनुच्छेद 21 - व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नही. 
(3) गरिमापूर्ण मरने का अधिकार - अनुच्छेद 21 के अंतर्गत
(4) संवैधानिक खंडपीठ Article 145(3) mandates that any matter that involves “a substantial question of law as to the interpretation of this Constitution” should be heard by a Bench of not less than five Judges of the Supreme Court – what is commonly referred to as a Constitution.


Monday, 12th Mar 2018, 07:40:27 PM

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