डोकलाम विवाद -भारत - चीन सम्बन्ध


Ajit Kumar AJIT KUMARWISDOM IAS, New Delhi.


28 अगस्त 2017 को   भारत और चीन ने डोकलाम से सेना हटाने का फैसला किया है.
भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में दोनों देशों के हितों और चिंताओं पर द्विपक्षीय वार्ता का हवाला देते हुए सेना हटाने की कार्रवाई शुरू करने की घोषणा की है.
 
ऐसा फैसला क्यों?
यह समझदारी भरा कदम है कि दोनों देशों ने सेना हटाने का फैसला किया है. क्योंकि जो भी कुछ हो रहा था उसका नतीजा युद्ध ही होता, जो शायद दोनों देश नहीं चाहते हैं. इससे न सिर्फ जानमाल का नुकसान होता, बल्कि जिन मोर्चों पर दोनों देश एक-दूसरे का समर्थन करते हैं, वह भी बिगड़ जाता.
भारत और चीन, दोनों देश सार्क, संघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन, ब्रिक्स जैसे मंचों पर एक-साथ बैठते हैं, बातचीत करते हैं. यहां दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों पर बातचीत होती है, जिसे सुरक्षा चिंता की वजह से खत्म नहीं किया जा सकता.
भारत इस फैसले को जीत-हार के रूप में देखने की जगह एक कूटनीतिक कदम के रूप में देख रहा है.
 
डोकलाम का  सामरिक महत्व
डोकलाम जिसे भूटान में डोलम कहते हैं. करीब 300 वर्ग किलोमीटर का ये इलाका चीन की चुंबी वैली से सटा हुआ है और सिक्किम के नाथुला दर्रे से मात्र 15 किलोमीटर की दूरी पर है. भौगोलिक रूप से डोकलाम भारत चीन और भूटान बार्डर के तिराहे पर स्थित है. चुंबी घाटी में स्थित डोकलाम सामरिक दृष्टि से भारत और चीन के लिए काफी महत्वपूर्ण है. भारत और चीन के बीच साल 1962 में एक युद्ध हो चुका है. दोनों देश के बीच 3500 किमी लंबी सीमा है, जिसके कई हिस्सों में समय-समय पर विवाद उठता रहता है.
 
 
डोकलाम विवाद
मई 2017 में भारत ने चीन की 'वन बेल्ट वन रोड' परियोजना का हिस्सा बनने से इंकार कर दिया. इसके बाद जून महीने में रॉयल भूटान आर्मी ने डाकोला के डोकलाम इलाके में सड़क बना रहे चीनी सैनिकों को रोका.
भूटान ने नई दिल्ली स्थित चीनी दूतावास में इस पर प्रतिरोध जताया. इसके बाद चीन ने भारतीय सेना पर सड़क निर्माण में बाधा पहुंचाने का आरोप लगाया, चीन ने कहा कि सड़क निर्माण का काम उसके अपने इलाके में हो रहा है.
इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच लगातार तनाव बढ़ता  गया
 
चीन और भूटान
साल 1988 और 1998 में चीन और भूटान के बीच समझौता हुआ था कि दोनों देश डोकलाम क्षेत्र में शांति बनाए रखने की दिशा में काम करेंगे.

भारत और भूटान
साल 1949 में भारत और भूटान के बीच एक संधि हुई थी, जिसमें तय हुआ था कि भारत अपने पड़ोसी देश भूटान की विदेश नीति और रक्षा मामलों का मार्गदर्शन करेगा. साल 2007 में इस मुद्दे पर एक नई दोस्ताना संधि हुई, जिसमें भूटान के भारत से निर्देश लेने की जरूरत को खत्म कर दिया गया और यह वैकल्पिक हो गया.

डोकलाम मुद्दे पर चीन का रुख़
तमाम विवादित मुद्दों पर इतिहास का संस्मरण देने वाला चीन डोकलाम मुद्दे पर भी कुछ ऐसा ही तर्क दिया. चीन के अनुसार डोकलाम नाम का इस्तेमाल तिब्बती चरवाहे पुराने चारागाह के रूप में करते थे. चीन का ये भी दावा है कि डोकलाम में जाने के लिए 1960 से पहले तक भूटान के चरवाहे उसकी अनुमति लेकर ही जाते थे.

डोकलाम मुद्दे पर भारत का रुख़
डोकलाम का इलाका भारत के लिए सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है. भारत के सिक्किम, चीन और भुटान के तिराहे पर स्थित डोकलाम पर चीन हाइवे बनाने की कोशिश में है, जिसका भारतीय खेमा विरोध कर रहा है. उसकी बड़ी वजह ये है कि अगर डोकलाम तक चीन की सुगम आवाजाही हो गई तो फिर वह भारत को पूर्वोत्तहर राज्यों से जोड़ने वाली चिकन नेक तक अपनी पहुंच और आसान कर सकता है. 

इस इलाके में भारतीय क्षेत्र में सेना ने सड़क निर्माण का काम शुरू कर दिया है, जो चीन के मंसूबों पर लगाम लगाने की भारत की बड़ी कवायद है. भारत की टेंशन ये है कि अगर चीन डोकलाम इलाके में अपना वर्चस्व साबित करने में कामयाब हो गया तो वो 'चिकन नेक' इलाके में बढ़त ले लेगा, जो भारत के लिए नुकसानदायक होगा.

युद्ध की स्थिति में डोकलाम में कब्जा होने का लाभ चीन को मिलेगा जिसकी जद में सिलिगुडी से लेकर उसके आसपास का इलाका आ जाएगा. अगर चीन डोकलाम में अपनी तोपें तैनात करता है तो उसकी जद में भारत का चिकन नेक वाला इलाका आएगा, जिससे पूर्वोत्तर से शेष भारत के कटने का खतरा बना रहेगा.

शुरूआत से ही चीन भारतीय सीमा के सामरिक इलाकों में अपनी बढ़त बनाने में लगा है. इसलिए उसने तिब्बत के दूरस्थद पहाड़ी इलाकों तक बड़े हाइवे का निर्माण कर लिया है, जो युद्ध की स्थिति में चीन के सैन्य साजो सामान को चंद घंटों में ही भारतीय सीमा तक पहुंचा सकते हैं.

जापान
डोकलाम में भारत और चीन में बने गतिरोध के बीच जापान की तरफ़ से बयान आया है कि यथास्थिति बदलने के लिए ताकत का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. जापान के ज़्यादातर अख़बारों ने यही कहा है कि मसले को बल से नहीं, बातचीत से निपटाना चाहिए.
जापान के ताज़ा रुख़ से यह तो लगता है कि वह भारत के पक्ष में था.
मगर उसकी अपनी चिंताएं हैं -
सेंकाकू द्वीपसमूह को लेकर एक वक़्त चीन और जापान के बीच गहरा तनाव पैदा हो गया था और आज भी दोनों के बीच खिंचाव बरकरार है.
चीन दरअसल सेंकाकू को लेकर जापान से नहीं बल्कि अमरीका से ज़ोर आज़माइश कर रहा था. मगर अमरीका ने कहा कि जापान के साथ हमारा समझौता है कि अगर किसी ने सेंकाकू पर हमला किया तो जवाब हम देंगे. इसके बाद चीन थम गया.

अमरीका
अमरीका ने कहा कि वह भारत , चीन और भूटान को प्रोत्साहित करता है कि वे साथ मिलकर शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत के जरिए मतभेद सुलझाएं। 
लगता है कि अमेरिका और भारत की करीबी चीन को पसंद नहीं आया.
 
 



Saturday, 09th Sep 2017, 06:26:27 PM

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