क्या चाहते हैं भारतीय किसान


Ajit Kumar AJIT KUMARWISDOM IAS, New Delhi.

हम सभी जानते हैं कि किसान क्यों दुखी है। किसान निराशा की हदें पार कर चुका है और लगता है उनके अब  पास दो ही विकल्प बचे  हैं- आंदोलन या आत्महत्या

 दिल्ली के जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों ने 41 दिनों तक प्रदर्शन किया। किसानों ने सरकार का ध्यान खींचने के लिए पेशाब पीने जैसे प्रतीकों का भी सहारा लिया। महाराष्ट्र में किसानों ने सब्जियों और दूध की सप्लाइ बंद कर दी और आखिर में सीएम देवेंद्र फडणवीस को यूपी की योगी सरकार की तरह ही लोन माफी का वादा करना पड़ा। इस साल हम जो समस्याओं का सामना कर रहे हैं वह कृषि उत्पादों के अधिक उत्पादन की वजह से है जिससे दरें गिर गई हैं।

लोन माफी इस समस्या का समाधन नहीं है। अगर सभी राज्य लोन माफी का तरीका अपनाते हैं तो उससे 2,70,000 करोड़ का बोझ पड़ेगा जिससे अन्य क्षेत्रों में निवेश कम हो जाएगा। लोन माफी में इस आधार पर भी भेदभाव होता है कि क्या किसान लोन वापस देने लायक है या नहीं। सोशल साइंटिस्ट नरेंद्र पनी का कहना है कि एमएसपी बढ़ा कर या लोन माफी का सीमित असर होगा और असल समस्या का समाधान नहीं होगा।

फिर, 'सभी किसान कर्जमाफी की मांग नहीं कर रहे, कुछ कर रहे हैं। यूपीए की सरकार ने भी कर्जमाफी की थी और वीपी सिंह की सरकार ने भी कर्ज माफ किया था। असली किसान जानते हैं कि यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति है। एक ऐसी लॉलीपॉप जो उन्हें कर्जे से मुक्ति नहीं दिला पाएगी।

इतना ही नहीं कर्जमाफी पाने वाले 15 से 20 प्रतिशत लाभार्थी झूठे किसान होते हैं। 25 से 30 प्रतिशत किसानों को कर्जमाफी का फायदा नहीं मिल पाता। दरअसल, किसानो को कर्जमाफी की जरूरत नहीं है बल्कि खेती में लगने वाले पैसे को कम करने और बदले में फसल का अच्छा दाम मिलने की जरूरत है।

इस समस्या के निवारण के लिए निम्न  बहुआयामी प्लान हो सकते हैं -

1) फसल खड़ी करने में जरूरी सभी चीजों जैसे उर्वरक, बीज, कृषि यंत्रों पर सब्सिडी। यह सब्सिडी सीधे किसान के खाते में जाए कंपनियों को नहीं।कृषि रिपोर्ट (PRS)

2) खेत से थाली तक अनाज लंबा रास्ता तय करता है। जिस रेट में किसान फसल बेचता है और जिस रेट पर उपभोक्ता फसल खरीदता है उसमें काफी अंतर होता है। बिचौलिए द्वारा लगाए जाने वाले चार्ज पर लिमिट लगा कर अंतर को कम किया जा सकता है।

3) किसानों को ब्याज मुक्त लोन मिले, जैसा एमपी और कर्नाटक में होता है और उस पर ब्याज केवल तभी लगाया जाए जब वह फसल बेचने के बावजूद लोन वापस न करें। 

4) स्थानीय किसानों को बजट और प्लानिंग से जुड़ी चर्चाओं में शामिल किया जाए। 

5) देश के कुल 70 कृषि विश्वविद्यालयों में कम से कम 15 को ऑगर्निक विश्वविद्यालय में बदल दिया जाए। जिससे लागत को कम करने और फसल को बढ़ाने की दिशा में नए प्रयोग किए जा सके।

6) किसानों का शोषण करने वाले चीनी मिलों टमाटर कारोबारियों के लिए कड़े कानून लाए जाएं और सुनिश्चित हो कि किसान को अपनी फसल का दाम समय से मिले। 

7) किसान संगठनों की मांग है कि कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन और किसानों के राष्ट्रीय आयोग के 'डिस्ट्रेस फॉर्म्यूला' को लागू किया जाए। इसके अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) फसल की लागत में 50 प्रतिशत जोड़ कर हो।



Sunday, 18th Jun 2017, 07:12:01 AM

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