आरबीआइ बनाम केंद्र सरकार


Ajit Kumar AJIT KUMARWISDOM IAS, New Delhi.


इन मुद्दों पर है विवाद



हालांकि काफी समय से विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच टकराव चल रहा है। सरकार अर्थव्यवस्था के पिछड़ने का हवाला देकर अपनी मांगें मनवाना चाहती है, तो आरबीआई का कहना है कि अगर वह सरकार की मांगों को मान लेता है, तो इससे बैंकिंग प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी।

(1) आरबीआई के पास कैश रिजर्व
सरकार का कहना है कि दुनिया के दूसरे केंद्रीय बैंक कुल परिसंपत्तियों का 16-18 फीसद रिजर्व में रखते हैं जबकि आरबीआइ 26 फीसद रखता है। आरबीआइ इसका एक हिस्सा केंद्र को दे सकता है जिसका इस्तेमाल ढांचागत सुविधाओं के विकास में किया जा सकता है। लेकिन आरबीआइ का तर्क है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की तुलना अमेरिका, जापान, चीन से नहीं की जा सकती। यहां के बैंकिंग सिस्टम का बुनियादी ढांचा अभी भी बेहद मजबूत नहीं है। ऐसे में आरबीआइ के पास बड़ा रिजर्व फंड होना चाहिए जिसका इस्तेमाल वित्तीय संकट के काल में किया जा सके।
RBI's has Rs 3.6 lakh crore ($48.73  billion) of capital reserves.

(2) छोटे मझोले उद्योगों को कर्ज
दैनिक जागरण ने पहले ही यह खबर प्रकाशित की है कि वित्त मंत्रालय इस बैठक को लेकर कितना गंभीर है। चुनावी वर्ष में सरकार बिल्कुल नहीं चाहती कि छोटे मझोले उद्योगों को कर्ज मिलने में कोई परेशानी हो। दूसरी तरफ अभी बैंकिंग व्यवस्था में फंड की किल्लत होने से छोटे व मझोले उद्योगों के साथ ही हाउसिंग, आटो लोन में भी दिक्कत हो रही है। 11 बैंकों पर आरबीआइ की तरफ से प्रोम्प्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) के तहत पाबंदी लगी है जिससे वह कर्ज नही बांट पा रहे हैं। इससे भी देश के बड़े हिस्से में पर्याप्त कर्ज नहीं मिल रहा है।

(3) सरकारी बैंकों का रेग्युलेशन
नीरव मोदी द्वारा किए गए पंजाब नेशनल बैंक घोटाले को पकड़ने में नाकाम रहने के लिए सरकार ने आरबीआई की कड़ी आलोचना की थी। इस पर गवर्नर ने आरोप लगाया कि सरकारी बैंकों के रेग्युलेशन के लिए सरकार उसे शक्तियां नहीं दे रही। केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने यह कहते हुए पलटवार किया कि आरबीआई के पास इसके लिए पर्याप्त शक्तियां थीं और सरकारी बैंकों के सीईओ की नियुक्ति पर उससे परामर्श लिया गया था।
(4) आरबीआइ बोर्ड में नियुक्तियां
आरबीआइ और केंद्र सरकार के बीच नियुक्तियों को लेकर भी विवाद चल रहा है। नचिकेत मोर को उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही बिना सूचना दिए बोर्ड से हटा दिया गया। आरबीआई के सीओओ के लिए दिग्गज बैंकर नचिकेत मोर पूर्व गवर्नर रघुराम राजन की पहली पसंद थे। नचिकेत मोर सरकार द्वारा मांगे गए अधिक लाभांश का शुरुआत से विरोध करते आ रहे थे। सरकार पर बोर्ड में अपने पसंदीदा लोगों को भरने का आरोप लगाया गया है, इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े एस. गुरुमूर्ति और सतीश मराठे भी शामिल हैं।

(5) तेल कंपनियों के लिए विशेष डॉलर विंडो
तेल कंपनियों की फॉरेन एक्सचेंज मार्केट (फॉरेक्स) जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई द्वारा विशेष डॉलर विंडो खोलने के लिए मना करने पर केंद्र सरकार को कंपनियों को विदेश से कर्ज लेने की मंजूरी देने को मजबूर होना पड़ा। इसे लेकर भी आरबीआइ और केंद्र सरकार आमने-सामने हैं।

(6) Payment Regulator
The government wants to set up a payment regulator which has been opposed by the central banker.

(7) आरबीआइ अधिनियम की धारा-7
गौरतलब है कि वित्त मंत्रालय ने कानून मंत्रालय से मशविरा कर रखा है कि अगर आरबीआइ के शीर्ष लोगों की राय नहीं बदलती है, तो वह आरबीआइ एक्ट की धारा-7 के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकता है।
जानकारों का कहना है कि अगर सरकार की तरफ से ऐसा कदम उठाया जाता है तो आरबीआइ गवर्नर पटेल के सामने अपने पद से इस्तीफा देने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा।
आरबीआइ अधिनियम की धारा-7 केंद्र सरकार को यह अधिकार देता है कि वह अपनी मर्जी के मुताबिक फैसले केंद्रीय बैंक को करने के लिए निर्देश दे सकता है। इस धारा का इस्तेमाल सरकार की तरफ से आज तक नहीं हुआ है।
 धारा-7 का इस्तेमाल करना एक बेहद संवदेनशील मामला हो सकता है। लिहाजा सरकार इसके लिए हर तरह से चाक चौबंद हो जाना चाहती है। इस बारे में वित्त मंत्रालय ने कानून मंत्रालय की राय मांगी थी। सूत्रों के मुताबिक कानून मंत्रालय ने सरकार को इस धारा के इस्तेमाल करने की हरी झंडी दिखा दी है। धारा-7 में केंद्र सरकार के अधिकार स्पष्ट तौर पर निर्धारित है।
अगर इसका अभी तक इस्तेमाल नहीं किया गया है तो यह मतलब नहीं है कि आगे भी नहीं किया जा सकता है। जाहिर है कि इस बारे में कानून मंत्रालय से राय मशविरा करना ही वित्त मंत्रालय के स्तर पर इस मामले की गंभीरता को प्रदर्शित करता है।
 
19 नवम्बर
, 2018 को आरबीआई बोर्ड की बैठक के परिणाम

व्यापक तौर पर देखा जाए तो सरकार जहां अर्थव्यवस्था, नकदी और ऋण की कमी को लेकर चिंतित थी, वहीं आरबीआई प्रबंधन तय मानकों को लेकर कुछ ज्यादा ही संरक्षणवादी रुख अपना रहा था। दोनों असहमति एक बड़े संकट में बदल गई थी और कहा जा रहा था कि सरकार आरबीआई अधिनियम की धारा 7 का इस्तेमाल करने जा रही है।
इस धारा के तहत वह आरबीआई को अपना निर्णय मानने को बाध्य कर सकती है। पिछले पखवाड़े इस विवाद को थामने के कुछ प्रयास किए गए लेकिन ऐसी अटकल थी कि आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल इस्तीफा दे सकते हैं। अगर ऐसा होता तो यह देश की नीति निर्माण व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होता। इस परिदृश्य में यह बहुत राहत की बात रही कि आरबीआई के 18 सदस्यीय मजबूत केंद्रीय बोर्ड ने तमाम विवादों को परे करते हुए यह सुनिश्चित किया कि आरबीआई की सांस्थानिक विश्वसनीयता को कोई क्षति न पहुंचे। 
बोर्ड ने चार विवादास्पद मसलों पर चर्चा की:
i. आरबीआई का आर्थिक पूंजी ढांचा (ECF),
ii. घाटे और फंसे हुए कर्ज की समस्या से जूझ रहे बैंकों के लिए तात्कालिक सुधारात्मक कदम ढांचा (PCA),
iii. संकटग्रस्त मझोले, छोटे और सूक्ष्म उपक्रमों (MSME) के लिए ऋण पुनर्गठन की योजना और
iv. बैंकों के लिए बेसल नियामकीय पूंजी ढांचा
(1) इनमें से कोई भी मसला ECF जैसा विवादास्पद नहीं था क्योंकि कथित तौर पर सरकार की यह इच्छा थी कि वह केंद्रीय बैंक के अतिरिक्त भंडार के कहीं ज्यादा बड़े हिस्से का इस्तेमाल कर सके। आरबीआई ऐसी मांग का कड़ा विरोध कर रहा था। उसका कहना था कि देश की वित्तीय स्थिरता के लिए यह राशि आवश्यक है।
अंत में बोर्ड ने समझदारी का परिचय देते हुए ECF के परीक्षण के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का निर्णय लिया। इसकी सदस्यता और संदर्भ शर्तों का निर्धारण सरकार और आरबीआई मिलकर करेंगे। दोनों पक्षों ने पीसीए ढांचे को लेकर भी लचीलापन दिखाया। दो अन्य मुद्दों की बात करें तो आरबीआई ने सरकार की इच्छाओं का काफी हद तक मान रखा
(2) On the PCA, Board for Financial Supervision (BFS) of RBI agrees to review the norms and will take a call if some of the parameters like net non-performing asset (NPA) ratio could be relaxed so that some of the banks come out of the PCA. There are 11 public sector banks out of 21 that are on PCA.
 
(3) बोर्ड ने आरबीआई प्रबंधन को यह मशविरा दिया कि वह MSMEs के कर्जदारों की ऋणग्रस्त मानक परिसंपत्तियों के पुनर्गठन की योजना पर विचार करे। यह सुविधा 25 करोड़ रुपये तक की ऋण सुविधा वाले संस्थानों के लिए तैयार की जानी है।
(4) बेसल नियामकीय पूंजी  - केंद्रीय बैंक ने बैंकों के पूंजी और जोखिम के 9 फीसदी के अनुपात के अनुपालन के लिए समय अवधि में भी इजाफा किया।  The deadline for implementing the last tranche of 0.625% under the capital conservation Buffer (CCB), has been extended by one year, that is, up to March 31, 2020.
(5) Two other important issues that could not be discussedliquidity for non-banking financial companies and governance issues of RBI- and those will be taken up in the next board meeting, scheduled on 14 December, sources said.
अब पूरा ध्यान दिसंबर में होने वाली आगामी बैठक पर केंद्रित हो गया है। उस दौरान आरबीआई में संचालन जैसे कुछ अन्य मुद्दों पर चर्चा होगी।
 यह पहला मौका नहीं है जब आरबीआई की स्वायत्तता इस तरह चर्चा में आई है। यह अंतिम अवसर भी नहीं होगा। अतीत में तमाम आरबीआई गवर्नरों ने शक्तिशाली वित्त मंत्रियों द्वारा अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप पर सवाल उठाए हैं।

There have been times when the RBI and the Central government did not see eye-to-eye. The first Indian RBI governor – C.D. Deshmukh - had differences with the government over the nationalisation of the central bank. He wanted to keep the RBI private and out of reach of the central government o Second Indian RBI governor, Benegal Rama Rau resigned in 1957 over his differences with the then finance minister (T.T. Krishnamachari).

आरबीआई और सरकार के बीच थोड़ा टकराव तो लाजिमी है लेकिन इसे सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहिए।

 




Wednesday, 21st Nov 2018, 04:05:35 PM

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